मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद से पुलिसिंग व्यवस्था पर सवाल उठाने वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ पुलिस विभाग की एक बड़ी लापरवाही (या मिलीभगत) उजागर हुई है, जिसमें एक ऐसे व्यक्ति को सरकारी गनर की सुरक्षा प्रदान कर दी गई है, जिसके खिलाफ अदालत ने गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर रखा है।
कोर्ट का आदेश बनाम पुलिस की सुरक्षा
यह मामला तब प्रकाश में आया जब संबंधित न्यायालय ने एक आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति की निरंतर अनुपस्थिति को देखते हुए उसके खिलाफ कड़ा रुख अपनाया।
न्यायालय की कार्रवाई: अदालत ने आरोपी को गिरफ्तार कर पेश करने के लिए 'गैर-जमानती वारंट' (Non-Bailable Warrant) जारी किया था।
पुलिस का कदम: एक तरफ जहाँ पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेजना चाहिए था, वहीं दूसरी तरफ मेरठ पुलिस के सुरक्षा बेड़े ने उसे बाकायदा एक 'सरकारी गनर' मुहैया करा दिया।
सुरक्षा समिति और खुफिया विभाग पर सवाल
सरकारी गनर देने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है, जिसमें जिला स्तरीय सुरक्षा समिति (District Security Committee) और खुफिया विभाग (LIU) की रिपोर्ट अनिवार्य होती है।
एलआईयू की रिपोर्ट: क्या खुफिया विभाग को यह जानकारी नहीं थी कि जिस व्यक्ति को सुरक्षा दी जा रही है, वह कोर्ट से वांछित है?
समीक्षा बैठक: सुरक्षा देने से पहले व्यक्ति के आपराधिक इतिहास की जांच क्यों नहीं की गई?
विभाग में मची खलबली
सोशल मीडिया और स्थानीय हलकों में इस खबर के वायरल होने के बाद पुलिस के उच्चाधिकारियों में हड़कंप मच गया है।
जांच के आदेश: वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल जांच के आदेश दिए हैं।
गनर की वापसी: सूत्रों के अनुसार, मामला उजागर होते ही गनर को वापस बुलाने और सुरक्षा रिपोर्ट की दोबारा समीक्षा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
कानून के राज पर उठते सवाल
विपक्ष और स्थानीय नागरिकों ने इस घटना को 'अपराधियों के संरक्षण' के रूप में देखा है। लोगों का कहना है कि एक तरफ आम आदमी सुरक्षा के लिए भटकता है, वहीं दूसरी तरफ कानून की अवहेलना करने वालों को सरकारी तामझाम के साथ सुरक्षा दी जा रही है।
अदालत ने भी इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अब देखना यह होगा कि इस बड़ी चूक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर क्या गाज गिरती है।
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